- इस पुस्तक की आवश्यकता इसलिए भी महत्व रखती है, क्योंकि इंटरनेट की दुनिया आज प्राथमिक ज़रूरतों में शामिल हो चुकी है और जिस गूगल सर्च-इंजन पर हम इंटरनेट से कोई विषय खोजते हैं, वह हमारे देश का नहीं है। द्वितीय पहलू यह है कि पुस्तकें तो कई सारी हैं, लेकिन विभिन्न विषयों पर विभक्त हैं। ऐसे में, सदियों, शताब्दियों या सहस्राब्दियों बाद भी अगर कोई सनातन के ध्वज को थामने वाला पुरोधा इस विषय पर अनुसंधान करे... तो उसे सत्य की परिधि में संकलित और संदर्भित सारे तथ्य समेत कई तत्कालीन विद्वानों के शोध या आलेख एक जगह उपलब्ध हो जाएं और विश्व के लोगों को यह मालूम हो जाए कि कैसे लगभग 500 वर्षों के लंबे संघर्षकाल के बाद 20वीं शताब्दी में नरेंद्र दामोदरदास मोदी जैसे प्रभावशाली व्यक्तित्व को वर्ष 2014 में देश का नेतृत्व मिला। उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में कई ऐतिहासिक कार्यों के साथ अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए अदालत में श्रीरामलला का पक्ष साक्ष्यपरक रूप से मजबूती से रखा और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट का श्रीरामलला के पक्ष में निर्णय आया, अपने दूसरे कार्यकाल के एक वर्ष बाद ही प्रभु के भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमि-पूजन का कार्य संपन्न किया और अब दूसरे ही कार्यकाल के अंतिम दौर में भगवान श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का पावन-कार्य संपन्न हुआ है। इस तरह एक गंभीर विषय पर पूर्ण-विराम भी लगा।
- पुस्तक के विषय-वस्तु पर थोड़ी और गहराई से प्रकाश डालें तो "अयोध्या का अध्यात्म से नाता" विषय से इस ग्रंथ की शुरूआत हुई है। पवित्र रामायण और रामचरितमानस के अलावा पुराणों और वेदों में अयोध्या जी और कौशल जी के वर्णन को संदर्भ सहित उल्लेख करने का प्रयत्न किया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अयोध्या की आध्यात्मिक गरिमा को गौरव के साथ समझ सकें। इक्ष्वाकु वंश तथा सूर्यवंश के बाद अयोध्या में सर्वधर्म सम्भाव, राजा विक्रमादित्य के द्वारा मंदिर-निर्माण, मुगलों के अत्याचार और फिर अंग्रेजों के दमन के दौरान की अयोध्या, हमारी आस्था के साथ खिलवाड़, विवाद की शुरूआत एवं श्रीरामलला के मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष को चरणबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
- अदालत में गंभीरतापूर्ण सुनवाई व वर्ष 2019 में पांच जजों की पीठ द्वारा 40 दिनों तक लगातार इस मामले की सुनवाई को विशेष तरीके से दिनवार प्रस्तुत किया गया है, ताकि सहस्राब्दियों बाद भी मा. सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोई झूठ की परत न चढ़ाई जा सके। फैसले के बाद विश्वभर में सनातनी उत्साह, मीडिया की सकारात्मक ख़बरें एवं मा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के हाथों ऐतिहासिक भूमि-पूजन और फिर अयोध्या में प्रभु के भव्य मंदिर निर्माण हेतु निधि समर्पण अभियान के साथ इस संघर्ष के साक्षी रहे कई सज्जनों एवं संतों का भावपूर्ण आलेख, अयोध्या में सर्वधर्म सम्भाव, इस भाव को स्थापित करने वाले मंदिरों का विवरण, भगवान श्रीराम से संबंधित कई ऐसी भ्रांतियां जो समाज में विष की तरह घोल दी गई है, उन अधिकांश विषयों पर संतों के आलेख के अलावा दर्जनों ऐसे धार्मिक, सामाजिक तथा तथ्यपरक विचार आमंत्रित कर संकलित किए गए हैं जो सहस्राब्दियों बाद भी एक प्रमुख संदर्भ का कार्य कर सकते हैं।
- इसके अलावा इस पुस्तक-ग्रंथ में कई भारतीय भाषाओं में रामायण के वर्णन को सम्मिलित किया गया है। भगवती सीताजी के जीवनकाल (जिसका वर्णन बहुत अधिक नहीं मिलता) पर भी बहुत सारी ज्ञानवर्धक विषयक सामग्री यहां प्राप्त हो सकती है। वहीं, भगवान के विवाह-उत्सव के दौरान की झलक को शब्दों के माध्यम से आप अनुभूति कर सकते हैं, प्रभुश्रीरामजी के आदर्श जीवन-दर्शन की सुंदर झलक भी यहां से आप जान सकते हैं। साथ ही अयोध्या की लोककला, संस्कृति एवं वैभव की पौराणिक तथा ऐतिहासिक गाथा का उल्लेख करते हुए वर्तमान में कैसे उसी गौरव को वापस लौटाने की पहल की जा रही है, इस पर विस्तृत आलेख को प्रस्तुत किया जा रहा है। कोई कथावाचक या आध्यात्मिक वक्ता बनना चाहे तो यहां नौ खण्डों में विस्तृत-विषय को प्रस्तुत किया गया है।
- आज भी चिंतन में वर्ष 1528 का वो दौर सोचकर शरीर सिहर उठता है, जब एक लाख चौहत्तर हज़ार लोगों के बलिदान को हम याद करते हैं। इतने बलिदानों के बाद ही मीर बांकी जैसे आतातायी अपने मनसूबे में सफल हो पाए थे। समझिए, ये उस दौर के संघर्ष को, बलिदान को, जब संचार का माध्यम शून्य था। यहां सोचने की बात है कि उन लोगों ने श्रीरामलला के स्थान को ही अपना निशाना क्यों बनाया, क्योंकि भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृति के उच्चतम प्रतिमान रहे। वो न केवल हिंसक और उन्मादी थे, वो इस हद तक आक्रांता थे, जो उस संस्कृति को चुनौती देने आए थे जो विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है और वो ऐसा इसलिए कर सके, क्योंकि उस संस्कृति का आधार अहिंसा है। अयोध्या की बात हो या मथुरा या काशी की, यमुना देवी का मंदिर जामा मस्जिद बन गया हो, या तेजो महालेश्वर ताजमहल बन गया हो... उन आक्रांताओं को जहां अवसर मिला, तोड़-फोड़ कर हमारे देश को सांस्कृतिक रूप से नष्ट करने की पूरी कोशिश की गई। लेकिन सच है कि कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। न कभी मिटेगी, क्योंकि यह ऋषियों, तपस्वियों और महापुरुषों की भूमि है। परिणामस्वरूप, आर्कियोलॉजिकल एविडेंसेज या हिस्टोरिकल फेक्ट्स के आधार पर हमने सर्वोच्च न्यायालय में यह लड़ाई हमने जीती और आज इस ऐतिहासिक अद्भुत मंदिर का स्वरूप सबके सामने है।
- लेकिन हम अपनी आने वाली पीढ़ी को यही कहना चाहते हैं कि हमें कभी नहीं भूलना है कि अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या, जैसे तथ्यों को। अयोध्या के शाब्दिक तात्पर्य को, जो है, जिसे जीता न जा सके। हमें कभी नहीं भूलना है कि अष्टचक्रा नवद्वारा के बड़े तात्विक अर्थ हैं- आठ चक्र और नौ द्वारों पर बसी हुई अयोध्या। हमें नहीं भूलना है कि हमारे शरीर में भी नौ द्वार हैं- दो नासिका, दो कान, एक मुख, दो आंखें, दो मल-मूत्र के और हमारे शरीर को भी अयोध्या कहा गया है। वो अयोध्या कैसी थी, उसका प्रमाण है हमारा शरीर। हमें कभी नहीं भूलना कि वो अलग तरीके का नगर था, जिसे इक्क्षाकु वंश के राजाओं ने बसाया था। हम आने वाली पीढ़ी के हाथों में बहुत बड़ी विरास्त सौंपने जा रहे हैं, जिसे उन्हें संभालना है और इस विरासत के साहित्यिक प्रमाण के लिए ‘श्रीरामलला- मन से मंदिर’ तक जैसे ग्रंथ सहस्राब्दियों तक एक संदर्भ ग्रंथ प्रमाणित होगा।
- सबसे प्रमुख कि यह पुस्तक-ग्रंथ "श्रीरामलला- मन से मंदिर तक" हिन्दी के अलावा 10 अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में प्रकाशित हो रहा है, भारत के आलावा 21 देशों में विमोचन होना है और संयुक्त राष्ट्र के सभी मान्य देशों में डिजिटल रूप से इसका प्रसार होगा। विदित है कि नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, संयुक्त राज्य, म्यांमार, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में सनातन को मानने वाले हमारे अपने लोग अधिकाधिक हैं। वियतनाम जैसे कई देश हैं जहां अब सनातन धर्म को पढ़ा जाता है और उसे जानने की कोशिश भी की जाती है। ऐसे में भगवान श्रीरामलला के मंदिर निर्माण की खुशी भारत में ही नहीं, अपितु पूरे विश्व के सनातन परिवार में है। यह ऐसी खुशी है जो समस्त सनातन परिवार की संस्कृति एवं गौरव के जीवंत एवं जागृति के भाव से उत्पन्न हुई है। प्रभु श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष और समाधान से जुड़े उपरोक्त कई तथ्यानुगत सत्य को जब हम अलग-अलग भाषाओं में विश्व के पटल पर रखेंगे, तो समस्त सनातन परिवार हर्षित हो उठेगा। सभी अपने देश में संबंधित भाषाओं में प्रभु श्रीराम के मानव-कल्याण संदेश और अयोध्या में प्रभु के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर के लिए संघर्ष की गाथा का बखान करेंगे।
- जब हम सब मिलकर इस पुस्तक-ग्रंथ का वैश्विक स्तर पर प्रसार करेंगे तो निस्संदेह सनातन परिवार समेत भगवती सीता एवं प्रभु श्रीरामजी में आस्था रखने वाले अपनी संस्कृति पर गौरवान्वित होंगे। यह ग्रंथ अपने सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करे और विश्वभर में ख्याति मिले, प्रभु से ऐसी प्रार्थना के साथ, रामायण रिसर्च काउंसिल की पूरी टीम को साधुवाद।
स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज
आचार्य महामंडलेश्वर, जूना अखाड़ा